श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 75: दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  1.75.21-22 
सनत्कुमारस्तं राजन् ब्रह्मलोकादुपेत्य ह॥ २१॥
अनुदर्शं ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ।
ततो महर्षिभि: क्रुद्धै: सद्य: शप्तो व्यनश्यत॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! ब्रह्मलोक से आकर सनत्कुमारों ने उन्हें बहुत समझाया और ब्राह्मणों पर अत्याचार न करने की सलाह दी, परन्तु वे उनकी शिक्षा स्वीकार न कर सके। तब क्रोध में भरे हुए महर्षियों ने तत्काल उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट हो गए॥ 21-22॥
 
Janamejaya! Sanatkumara came from Brahmaloka and tried to convince them a lot and advised them not to torture Brahmins, but they could not accept their teachings. Then the great sages filled with anger immediately cursed them, due to which they got destroyed. ॥ 21-22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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