Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.74.d61-d70: 'वे पक्षी भी पुण्यशाली हैं, जिन्होंने उस समय एकत्रित होकर अपने पंखों से मेरी रक्षा की थी। शकुन्तों (पक्षियों) ने मेरी रक्षा की, इसलिए मेरा नाम शकुन्तला पड़ा। तत्पश्चात् महात्मा कश्यपनन्दन कण्व की दृष्टि मुझ पर पड़ी। वे अग्निहोत्र के लिए जल लाने वहाँ गए थे। उन्हें देखकर पक्षियों ने मुझे अमानत की तरह उस दयालु ऋषि को सौंप दिया। वे मुझे अरणी (शमी) के समान अपने आश्रम में ले आए। राजन! ऋषि ने दया करके मुझे अपनी पुत्री के समान पाला। हे मनुष्यों के स्वामी! इस प्रकार मैं ऋषि विश्वामित्र की पुत्री हूँ और महात्मा कण्व ने मेरा पालन-पोषण किया है। आपने मुझे युवावस्था में देखा था। निर्जन वन में, आश्रम की कुटिया के भीतर एकांत स्थान में, जब मेरे पिता उपस्थित नहीं थे, विधाता की प्रेरणा से प्रभावित होकर आपने अपने मधुर वचनों से मुझ कुमारी कन्या को संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से मैथुन हेतु प्रेरित किया। धर्म, अर्थ और काम का ध्यान रखते हुए आप आश्रम में मेरे साथ रहीं। आपने गंधर्व विवाह संस्कार में मेरा हाथ थामा है। आज मैं अपने कुल, शील, सत्य और धर्म को सर्वोपरि रखते हुए आपकी शरण में आया हूँ। अतः अब पूर्व में की गई ऐसी प्रतिज्ञा को असत्य न करें। आप जगत के रक्षक हैं, आप मेरे प्राणनाथ हैं। मैं पूर्णतया निर्दोष हूँ और स्वयं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ, अतः आप अपना धर्म त्यागकर मुझे न त्यागें। | mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
'वे पक्षी भी पुण्यशाली हैं, जिन्होंने उस समय एकत्रित होकर अपने पंखों से मेरी रक्षा की थी। शकुन्तों (पक्षियों) ने मेरी रक्षा की, इसलिए मेरा नाम शकुन्तला पड़ा। तत्पश्चात् महात्मा कश्यपनन्दन कण्व की दृष्टि मुझ पर पड़ी। वे अग्निहोत्र के लिए जल लाने वहाँ गए थे। उन्हें देखकर पक्षियों ने मुझे अमानत की तरह उस दयालु ऋषि को सौंप दिया। वे मुझे अरणी (शमी) के समान अपने आश्रम में ले आए। राजन! ऋषि ने दया करके मुझे अपनी पुत्री के समान पाला। हे मनुष्यों के स्वामी! इस प्रकार मैं ऋषि विश्वामित्र की पुत्री हूँ और महात्मा कण्व ने मेरा पालन-पोषण किया है। आपने मुझे युवावस्था में देखा था। निर्जन वन में, आश्रम की कुटिया के भीतर एकांत स्थान में, जब मेरे पिता उपस्थित नहीं थे, विधाता की प्रेरणा से प्रभावित होकर आपने अपने मधुर वचनों से मुझ कुमारी कन्या को संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से मैथुन हेतु प्रेरित किया। धर्म, अर्थ और काम का ध्यान रखते हुए आप आश्रम में मेरे साथ रहीं। आपने गंधर्व विवाह संस्कार में मेरा हाथ थामा है। आज मैं अपने कुल, शील, सत्य और धर्म को सर्वोपरि रखते हुए आपकी शरण में आया हूँ। अतः अब पूर्व में की गई ऐसी प्रतिज्ञा को असत्य न करें। आप जगत के रक्षक हैं, आप मेरे प्राणनाथ हैं। मैं पूर्णतया निर्दोष हूँ और स्वयं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ, अतः आप अपना धर्म त्यागकर मुझे न त्यागें।
‘Those birds are also virtuous, who came together and protected me with their wings at that time. The Shakuntas (birds) protected me, hence my name became Shakuntala. Thereafter, the eyes of Mahatma Kashyapanandan Kanva fell on me. He had gone there to bring water for Agnihotra. Seeing him, the birds handed me over to that kind sage like a trust. He brought me like an Arani (Shami)- plant to his ashram. King! The sage kindly raised me like his own daughter. O Lord of men! Thus I am the daughter of sage Vishwamitra and Mahatma Kanva has brought me up. You had seen me when I was young. In a deserted forest, in a lonely place inside the hut of the ashram, when my father was not present, influenced by the inspiration of the creator, you inspired me, a virgin girl, to have sexual intercourse for the purpose of procreation with your sweet words. Keeping an eye on Dharma, Artha and Kaam, you stayed with me in the ashram. You have taken my hand in the Gandharva marriage ritual. Today I have come to your refuge keeping my lineage, modesty, truthfulness and Dharma in the forefront. Therefore, do not make such a promise in the past untrue now. You are the protector of the world, you are my Praannath. I am completely innocent and I myself am present in your service, so do not abandon me leaving your Dharma behind.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥