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mahabharat 1.74.d50-29: जो महात्मा मिथ्यात्व से सर्वदा दूर रहते हैं, उनकी दृष्टि में धर्म ही कल्याणकारी है। धर्म कभी दुःख नहीं देता। पाप करने के पश्चात् मनुष्य यह सोचता है कि उसे कोई नहीं जानता, परन्तु उसका यह सोचना भारी भूल है; क्योंकि सभी देवता तथा सर्वज्ञ ईश्वर भी मनुष्य के पाप-पुण्य को देखते और जानते हैं॥ 29॥   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक d50-29
 
 
श्लोक  1.74.d50-29 
(धर्म एव हि साधूनां सर्वेषां हितकारणम्।
नित्यं मिथ्याविहीनानां न च दु:खावहो भवेत्॥ )
मन्यते पापकं कृत्वा न कश्चिद् वेत्ति मामिति।
विदन्ति चैनं देवाश्च यश्चैवान्तरपूरुष:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
जो महात्मा मिथ्यात्व से सर्वदा दूर रहते हैं, उनकी दृष्टि में धर्म ही कल्याणकारी है। धर्म कभी दुःख नहीं देता। पाप करने के पश्चात् मनुष्य यह सोचता है कि उसे कोई नहीं जानता, परन्तु उसका यह सोचना भारी भूल है; क्योंकि सभी देवता तथा सर्वज्ञ ईश्वर भी मनुष्य के पाप-पुण्य को देखते और जानते हैं॥ 29॥
 
‘In the eyes of all those saints who always stay away from falsehood, only Dharma is beneficial. Dharma never causes pain. After committing sins, a man thinks that no one knows him, but this thinking of his is a grave mistake; because all the gods and the omniscient God also see and know the sins and virtues of man.॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)