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mahabharat 1.74.d39: शकुन्तला के ऐसा कहने पर कण्व ऋषि, जो सिर झुकाये बैठे थे, कुछ न बोल सके; मानव स्वभाव के अनुसार उनमें करुणा उत्पन्न हो गयी और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक d39
 
 
श्लोक  1.74.d39 
एवमुक्तो नतशिरा मुनिर्नोवाच किञ्चन॥
मनुष्यभावात् कण्वोऽपि मुनिरश्रूण्यवर्तयत्।
 
 
अनुवाद
शकुन्तला के ऐसा कहने पर कण्व ऋषि, जो सिर झुकाये बैठे थे, कुछ न बोल सके; मानव स्वभाव के अनुसार उनमें करुणा उत्पन्न हो गयी और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
 
When Shakuntala said this, sage Kanva, who was sitting with his head bowed down, could not say anything; as per human nature, compassion arose in him and tears started flowing from his eyes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)