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mahabharat 1.74.d11-7: फिर वह उनकी पीठ पर चढ़कर उन्हें दबाता और खेलते हुए उनके चारों ओर दौड़ता। वहाँ युद्ध में राक्षस और पिशाच आदि समस्त शत्रुओं को मुक्कों से परास्त करके वह राजकुमार ऋषि-मुनियों की आराधना में लीन रहता। एक दिन एक अत्यंत बलवान राक्षस उसे मार डालने के इरादे से उस वन में आया। वह अन्य राक्षसों की दशा देखकर, जो प्रतिदिन उससे सताए जाते थे, क्रोध से भर गया। उसके आते ही राजकुमार ने अट्टहास किया और उसे दोनों हाथों से पकड़कर अपनी भुजाओं में कसकर दबा लिया। बहुत प्रयत्न करने पर भी वह उस बालक के चंगुल से अपने को छुड़ा न सका, अतः वह भयानक स्वर में चिल्लाने लगा। उस समय दबाव के कारण उसके अंगों से रक्त बहने लगा। उसकी चीख से भयभीत होकर हिरण और सिंह आदि जंगली जानवर मल-मूत्र त्यागने लगे और आश्रम में रहने वाले पशुओं का भी यही हाल हुआ। दुष्यंतकुमार ने घुटनों से प्रहार करके उस राक्षस के प्राण ले लिए; फिर उसे छोड़ दिया। जैसे ही राक्षस उसके हाथों से छूटा, वह गिर पड़ा। उस बालक का पराक्रम देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस दुष्यंतकुमार द्वारा प्रतिदिन अनेक दैत्यों और राक्षसों का वध किया जाता था। कुमार के भय से उन्होंने कण्व के आश्रम में जाना छोड़ दिया। यह देखकर कण्व के आश्रम में रहने वाले � ...   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक d11-7
 
 
श्लोक  1.74.d11-7 
आरोहन् दमयंश्चैव क्रीडंश्च परिधावति।
(ततश्च राक्षसान् सर्वान् पिशाचांश्च रिपून् रणे।
मुष्टियुद्धेन ताञ्जित्वा ऋषीनाराधयत् तदा॥
कश्चिद् दितिसुतस्तं तु हन्तुकामो महाबल:।
वध्यमानांस्तु दैतेयानमर्षी तं समभ्ययात्॥
तमागतं प्रहस्यैव बाहुभ्यां परिगृह्य च।
दृढं चाबध्य बाहुभ्यां पीडयामास तं तदा॥
मर्दितो न शशाकास्य मोचितुं बलवत्तया।
प्राक्रोशद् भैरवं तत्र द्वारेभ्यो नि:सृतं त्वसृक्॥
तेन शब्देन वित्रस्ता मृगा: सिंहादयो गणा:।
सुस्रुवुश्च शकृन्मूत्रमाश्रमस्थाश्च सुस्रुवु:॥
निरसुं जानुभि: कृत्वा विससर्ज च सोऽपतत् ।
तं दृष्ट्वा विस्मयं चक्रु: कुमारस्य विचेष्टितम्॥
नित्यकालं वध्यमाना दैतेया राक्षसै: सह।
कुमारस्य भयादेव नैव जग्मुस्तदाश्रमम्॥ )
ततोऽस्य नाम चक्रुस्ते कण्वाश्रमनिवासिन:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
फिर वह उनकी पीठ पर चढ़कर उन्हें दबाता और खेलते हुए उनके चारों ओर दौड़ता। वहाँ युद्ध में राक्षस और पिशाच आदि समस्त शत्रुओं को मुक्कों से परास्त करके वह राजकुमार ऋषि-मुनियों की आराधना में लीन रहता। एक दिन एक अत्यंत बलवान राक्षस उसे मार डालने के इरादे से उस वन में आया। वह अन्य राक्षसों की दशा देखकर, जो प्रतिदिन उससे सताए जाते थे, क्रोध से भर गया। उसके आते ही राजकुमार ने अट्टहास किया और उसे दोनों हाथों से पकड़कर अपनी भुजाओं में कसकर दबा लिया। बहुत प्रयत्न करने पर भी वह उस बालक के चंगुल से अपने को छुड़ा न सका, अतः वह भयानक स्वर में चिल्लाने लगा। उस समय दबाव के कारण उसके अंगों से रक्त बहने लगा। उसकी चीख से भयभीत होकर हिरण और सिंह आदि जंगली जानवर मल-मूत्र त्यागने लगे और आश्रम में रहने वाले पशुओं का भी यही हाल हुआ। दुष्यंतकुमार ने घुटनों से प्रहार करके उस राक्षस के प्राण ले लिए; फिर उसे छोड़ दिया। जैसे ही राक्षस उसके हाथों से छूटा, वह गिर पड़ा। उस बालक का पराक्रम देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस दुष्यंतकुमार द्वारा प्रतिदिन अनेक दैत्यों और राक्षसों का वध किया जाता था। कुमार के भय से उन्होंने कण्व के आश्रम में जाना छोड़ दिया। यह देखकर कण्व के आश्रम में रहने वाले � ...
 
Then he would climb on their backs, suppressing them and running around them while playing. There, after defeating all the enemies like demons and vampires by punching them in the war, that prince used to remain engaged in worshipping the sages and saints. One day, a very powerful demon came to that forest with the intention of killing him. He was filled with resentment seeing the condition of other demons who were being harassed by him every day. As soon as he came, the prince laughed and caught him with both hands and pressed him tightly in his arms. Even after trying very hard, he could not free himself from the clutches of that child, so he started screaming in a terrifying voice. At that time, blood started flowing from his organs due to the pressure. Frightened by his screams, wild animals like deer and lion started defecating and urinating and the same happened to the animals living in the ashram. Dushyantkumar took the life of that demon by hitting him with his knees; then he left him. As soon as the demon was freed from his hands, he fell down. Seeing the valour of that boy, everyone was very surprised. Many demons and monsters were killed by that Dushyantkumar everyday. Out of fear of Kumar, they stopped going to Kanva's ashram. Seeing this, the sages living in Kanva's ashram gave him a new name -॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)