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mahabharat 1.74.93-94: जैसे संतजन बड़ों का आदर करके प्रसन्न होते हैं, वैसे ही मूर्ख लोग संतों की निंदा करके संतुष्ट होते हैं। संतजन दूसरों के दोषों को देखे बिना ही सुखी जीवन जीते हैं, परन्तु मूर्ख लोग सदैव दूसरों के दोषों को ही देखते रहते हैं। जिन दोषों के कारण दुष्ट लोग संतों द्वारा निंदा के योग्य माने जाते हैं, दुष्ट लोग उन्हीं दोषों को संतों पर आरोपित करके उनकी निंदा करते हैं॥93-94॥   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 93-94
 
 
श्लोक  1.74.93-94 
अभिवाद्य यथा वृद्धान् सन्तो गच्छन्ति निर्वृतिम्।
एवं सज्जनमाक्रुश्य मूर्खो भवति निर्वृत:॥ ९३॥
सुखं जीवन्त्यदोषज्ञा मूर्खा दोषानुदर्शिन:।
यत्र वाच्या: परै: सन्त: परानाहुस्तथाविधान्॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
जैसे संतजन बड़ों का आदर करके प्रसन्न होते हैं, वैसे ही मूर्ख लोग संतों की निंदा करके संतुष्ट होते हैं। संतजन दूसरों के दोषों को देखे बिना ही सुखी जीवन जीते हैं, परन्तु मूर्ख लोग सदैव दूसरों के दोषों को ही देखते रहते हैं। जिन दोषों के कारण दुष्ट लोग संतों द्वारा निंदा के योग्य माने जाते हैं, दुष्ट लोग उन्हीं दोषों को संतों पर आरोपित करके उनकी निंदा करते हैं॥93-94॥
 
Just as saints feel happy by paying respects to elders, foolish people feel satisfied by criticizing saints. Saints live a happy life without looking at the faults of others, but foolish people always look at the faults of others. The same faults due to which evil-minded people are considered worthy of criticism by saints, evil people blame the same faults on saints and criticize them.॥93-94॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)