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mahabharat 1.74.88: लेकिन जब भी वह दर्पण में अपना विकृत चेहरा देखता है, तब उसे अपने और दूसरों के बीच का अंतर समझ में आता है।   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  1.74.88 
यदा स्वमुखमादर्शे विकृतं सोऽभिवीक्षते।
तदान्तरं विजानीते आत्मानं चेतरं जनम्॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
लेकिन जब भी वह दर्पण में अपना विकृत चेहरा देखता है, तब उसे अपने और दूसरों के बीच का अंतर समझ में आता है।
 
But whenever he sees his distorted face in the mirror, then he understands the difference between himself and others. 88.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)