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mahabharat 1.74.87: जब तक एक कुरूप आदमी अपना चेहरा आईने में नहीं देखता, तब तक वह खुद को दूसरों से अधिक सुंदर समझता है। 87.   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  1.74.87 
विरूपो यावदादर्शे नात्मन: पश्यते मुखम्।
मन्यते तावदात्मानमन्येभ्यो रूपवत्तरम्॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
जब तक एक कुरूप आदमी अपना चेहरा आईने में नहीं देखता, तब तक वह खुद को दूसरों से अधिक सुंदर समझता है। 87.
 
Until an ugly man sees his face in the mirror, he thinks himself more beautiful than others. 87.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)