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mahabharat 1.74.81: तुम जो कुछ भी कह रही हो, वो मेरी आँखों के सामने नहीं हुआ है। तापसी, मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूँ। जहाँ चाहो वहाँ जाओ। 81.   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.74.81 
सर्वमेतत् परोक्षं मे यत् त्वं वदसि तापसि।
नाहं त्वामभिजानामि यथेष्टं गम्यतां त्वया॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
तुम जो कुछ भी कह रही हो, वो मेरी आँखों के सामने नहीं हुआ है। तापसी, मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूँ। जहाँ चाहो वहाँ जाओ। 81.
 
Whatever you are saying has not happened in front of my eyes. Taapsee, I do not recognize you. Go wherever you wish. 81.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)