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mahabharat 1.74.64: 'मेरा जीवन और अनन्त वंश तुम्हारे हाथों में है, इसलिए हे पुत्र! तुम बहुत सुखी रहो और सौ वर्ष तक जीवित रहो।' 64   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  1.74.64 
जीवितं त्वदधीनं मे संतानमपि चाक्षयम्।
तस्मात् त्वं जीव मे पुत्र सुसुखी शरदां शतम्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
'मेरा जीवन और अनन्त वंश तुम्हारे हाथों में है, इसलिए हे पुत्र! तुम बहुत सुखी रहो और सौ वर्ष तक जीवित रहो।' 64
 
'My life and the everlasting lineage of progeny are in your hands, therefore, O son, may you be very happy and live for a hundred years.' 64
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)