स त्वं स्वयमभिप्राप्तं साभिलाषमिमं सुतम्।
प्रेक्षमाणं कटाक्षेण किमर्थमवमन्यसे॥ ५४॥
अण्डानि बिभ्रति स्वानि न भिन्दन्ति पिपीलिका:।
न भरेथा: कथं नु त्वं धर्मज्ञ: सन् स्वमात्मजम्॥ ५५॥
अनुवाद
देखो, तुम्हारा यह पुत्र स्वयं ही तुम्हारे पास आया है और तुम्हारी गोद में बैठने के लिए आतुर है, तुम्हारी ओर प्रेम भरी दृष्टि से देख रहा है; फिर तुम उसका तिरस्कार क्यों करते हो? चींटियाँ भी अपने अण्डों का पालन-पोषण ही करती हैं, उन्हें तोड़ती नहीं। फिर तुम धर्म के ज्ञाता होकर भी अपने पुत्र का साथ क्यों नहीं देते?॥ 54-55॥
‘Look, this son of yours has come to you on his own and is eager to sit in your lap, looking at you with a loving sidelong glance; then why do you despise him. Even ants only nurture their eggs; they do not break them. Then why do you, despite being a knower of Dharma, not support your son?॥ 54-55॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥