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mahabharat 1.74.54-55: देखो, तुम्हारा यह पुत्र स्वयं ही तुम्हारे पास आया है और तुम्हारी गोद में बैठने के लिए आतुर है, तुम्हारी ओर प्रेम भरी दृष्टि से देख रहा है; फिर तुम उसका तिरस्कार क्यों करते हो? चींटियाँ भी अपने अण्डों का पालन-पोषण ही करती हैं, उन्हें तोड़ती नहीं। फिर तुम धर्म के ज्ञाता होकर भी अपने पुत्र का साथ क्यों नहीं देते?॥ 54-55॥   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  1.74.54-55 
स त्वं स्वयमभिप्राप्तं साभिलाषमिमं सुतम्।
प्रेक्षमाणं कटाक्षेण किमर्थमवमन्यसे॥ ५४॥
अण्डानि बिभ्रति स्वानि न भिन्दन्ति पिपीलिका:।
न भरेथा: कथं नु त्वं धर्मज्ञ: सन् स्वमात्मजम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
देखो, तुम्हारा यह पुत्र स्वयं ही तुम्हारे पास आया है और तुम्हारी गोद में बैठने के लिए आतुर है, तुम्हारी ओर प्रेम भरी दृष्टि से देख रहा है; फिर तुम उसका तिरस्कार क्यों करते हो? चींटियाँ भी अपने अण्डों का पालन-पोषण ही करती हैं, उन्हें तोड़ती नहीं। फिर तुम धर्म के ज्ञाता होकर भी अपने पुत्र का साथ क्यों नहीं देते?॥ 54-55॥
 
‘Look, this son of yours has come to you on his own and is eager to sit in your lap, looking at you with a loving sidelong glance; then why do you despise him. Even ants only nurture their eggs; they do not break them. Then why do you, despite being a knower of Dharma, not support your son?॥ 54-55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)