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mahabharat 1.74.53: जब कोई पुत्र पृथ्वी की धूल से लिपटा हुआ अपने पिता के शरीर के पास आकर लिपट जाता है, तो उससे बढ़कर और क्या आनन्द हो सकता है?॥ 53॥   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  1.74.53 
प्रतिपद्य यदा सूनुर्धरणीरेणुगुण्ठित:।
पितुराश्लिष्यतेऽङ्गानि किमस्त्यभ्यधिकं तत:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
जब कोई पुत्र पृथ्वी की धूल से लिपटा हुआ अपने पिता के शरीर के पास आकर लिपट जाता है, तो उससे बढ़कर और क्या आनन्द हो सकता है?॥ 53॥
 
'What can be greater than the joy that one gets when a son, smeared with the dust of the earth, comes near and clings to the body of his father?॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)