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mahabharat 1.74.51: 'प्रेम, स्नेह और धर्म पत्नी के हाथ में हैं, ऐसा सोचकर पुरुष को चाहिए कि क्रोध होने पर भी अपनी पत्नी के साथ अप्रिय व्यवहार न करे ॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  1.74.51 
सुसंरब्धोऽपि रामाणां न कुर्यादप्रियं नर:।
रतिं प्रीतिं च धर्मं च तास्वायत्तमवेक्ष्य हि॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
'प्रेम, स्नेह और धर्म पत्नी के हाथ में हैं, ऐसा सोचकर पुरुष को चाहिए कि क्रोध होने पर भी अपनी पत्नी के साथ अप्रिय व्यवहार न करे ॥ 51॥
 
'Regarding that love, affection and religion are in the hands of the wife, a man should not behave unpleasantly with his wife, even if he is angry. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)