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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.74.50 
दह्यमाना मनोदु:खैर्व्याधिभिश्चातुरा नरा:।
ह्लादन्ते स्वेषु दारेषु घर्मार्ता: सलिलेष्विव॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार सूर्य से जले हुए प्राणी जल में स्नान करके सुख का अनुभव करते हैं, उसी प्रकार जो लोग मानसिक दुःख और चिंताओं की अग्नि में जल रहे हैं तथा जो विभिन्न प्रकार के रोगों से पीड़ित हैं, वे अपनी पत्नी के पास आकर सुख का अनुभव करते हैं।
 
Just as creatures burnt by the sun feel relieved after taking a bath in water, similarly those who are burning in the fire of mental sorrow and worries and who are suffering from various kinds of diseases, feel happy when they are near their wives.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)