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mahabharat 1.74.31: 'जिसके हृदय में स्थित कर्मों के साक्षी परमात्मा संतुष्ट रहते हैं, उस मनुष्य के समस्त पापों का नाश स्वयं सूर्यपुत्र यमराज करते हैं ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.74.31 
यमो वैवस्वतस्तस्य निर्यातयति दुष्कृतम्।
हृदि स्थित: कर्मसाक्षी क्षेत्रज्ञो यस्य तुष्यति॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'जिसके हृदय में स्थित कर्मों के साक्षी परमात्मा संतुष्ट रहते हैं, उस मनुष्य के समस्त पापों का नाश स्वयं सूर्यपुत्र यमराज करते हैं ॥31॥
 
'On whom the Supreme Soul, the witness of deeds situated in the heart, remains satisfied, the son of Surya Yamraj himself destroys all the sins of that person. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)