Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.74.28: तू यह सोच रहा है कि उस समय मैं अकेला था (देखने वाला कोई नहीं था), परन्तु तू यह नहीं जानता कि वह सनातन मुनि (परमेश्वर) अन्तर्यामी रूप में सबके हृदय में स्थित है। वह सबके पाप-पुण्य को जानता है और तू उसके समीप रहकर पाप कर रहा है॥ 28॥ | mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एकोऽहमस्मीति च मन्यसे त्वं
न हृच्छयं वेत्सि मुनिं पुराणम्।
यो वेदिता कर्मण: पापकस्य
तस्यान्तिके त्वं वृजिनं करोषि॥ २८॥
अनुवाद
तू यह सोच रहा है कि उस समय मैं अकेला था (देखने वाला कोई नहीं था), परन्तु तू यह नहीं जानता कि वह सनातन मुनि (परमेश्वर) अन्तर्यामी रूप में सबके हृदय में स्थित है। वह सबके पाप-पुण्य को जानता है और तू उसके समीप रहकर पाप कर रहा है॥ 28॥
‘You are thinking that at that time I was alone (there was no one to see), but you do not know that that Sanatan Muni (God) is present in everyone's heart as Antaryami. He knows everyone's sins and virtues and you are committing sins by staying near him.॥ 28॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥