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mahabharat 1.74.21: जब दुष्यंत ने ऐसा कहा, तो सुंदर तपस्वी शकुंतला लज्जित हो गई और शोक से मूर्छित होकर स्तंभ के समान स्थिर खड़ी हो गई।   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.74.21 
सैवमुक्ता वरारोहा व्रीडितेव तपस्विनी।
नि:संज्ञेव च दु:खेन तस्थौ स्थूणेव निश्चला॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जब दुष्यंत ने ऐसा कहा, तो सुंदर तपस्वी शकुंतला लज्जित हो गई और शोक से मूर्छित होकर स्तंभ के समान स्थिर खड़ी हो गई।
 
When Dushyant said this, the beautiful ascetic Shakuntala felt ashamed and fainted out of grief and stood as still as a pillar.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)