श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  1.74.130 
याजयामास तं कण्वो विधिवद् भूरिदक्षिणम्।
श्रीमान् गोविततं नाम वाजिमेधमवाप स:।
यस्मिन् सहस्रं पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ॥ १३०॥
 
 
अनुवाद
महर्षि कण्व ने आचार्य बनकर भरत से प्रचुर दक्षिणा लेकर 'गोवित' नामक अश्वमेध यज्ञ किया। श्रीमान् भरत को उस यज्ञ का पूर्ण फल प्राप्त हुआ। उसमें महाराज भरत ने आचार्य कण्व को दक्षिणा स्वरूप एक हजार पद्म स्वर्ण मुद्राएँ प्रदान कीं। 130॥
 
Maharishi Kanva, being the Acharya, performed the Ashwamedha Yagya named 'Govitat' with abundant dakshina from Bharat. Shriman Bharat attained the full fruits of that Yagya. In that, Maharaja Bharatne gave one thousand padma gold coins in the form of Dakshina to Acharya Kanva. 130॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)