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mahabharat 1.74.109-110h: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! राजा दुष्यंत से यह बात कहकर शकुन्तला वहाँ से जाने को तैयार हुई। इतने में ही ऋत्विजों, पुरोहितों, आचार्यों और मन्त्रियों से घिरे हुए दुष्यंत को संबोधित करते हुए आकाशवाणी हुई ॥109 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 1.74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 109-110h
 
 
श्लोक  1.74.109-110h 
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा राजानं प्रातिष्ठत शकुन्तला।
अथान्तरिक्षाद् दुष्यन्तं वागुवाचाशरीरिणी॥ १०९॥
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मन्त्रिभिश्च वृतं तदा।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! राजा दुष्यंत से यह बात कहकर शकुन्तला वहाँ से जाने को तैयार हुई। इतने में ही ऋत्विजों, पुरोहितों, आचार्यों और मन्त्रियों से घिरे हुए दुष्यंत को संबोधित करते हुए आकाशवाणी हुई ॥109 1/2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! After saying these things to King Dushyant, Shakuntala got ready to leave from there. Meanwhile, a voice came from the sky addressing Dushyant who was surrounded by Ritvija, priest, Acharya and ministers. 109 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)