श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 74: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  1.74.100 
धर्मकीर्त्यावहा नॄणां मनस: प्रीतिवर्धना:।
त्रायन्ते नरकाज्जाता: पुत्रा धर्मप्लवा: पितॄन्॥ १००॥
 
 
अनुवाद
ये सभी पुत्र लोगों को धर्म और यश की प्राप्ति कराते हैं तथा मन की प्रसन्नता बढ़ाते हैं। पुत्र धर्म रूपी नाव का आश्रय लेकर अपने पितरों को नरक से छुड़ाते हैं। 100॥
 
All these sons help people attain religion and fame and increase the happiness of the mind. Sons take shelter in the boat of religion and rescue their ancestors from hell. 100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)