श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 73: शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन  »  श्लोक d16-d17
 
 
श्लोक  1.73.d16-d17 
शकुन्तलोवाच
राजा ताताजगामेह दुष्यन्त इलिलात्मज:।
मया पतिर्वृतो योऽसौ दैवयोगादिहागत:॥
तस्य तात प्रसीदस्व भर्ता मे सुमहायशा:।
अत: सर्वं तु यद् वृत्तं दिव्यज्ञानेन पश्यसि।
अभयं क्षत्रियकुले प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ )
 
 
अनुवाद
शकुन्तला बोली—पिताजी! इल्लिलकुमार महाराज दुष्यंत इस वन में आए थे। संयोगवश वे इस आश्रम में आए और मैंने उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया। पिताश्री! आप उन पर प्रसन्न हों। वे परम यशस्वी राजा अब मेरे स्वामी हैं। आप अपनी दिव्य ज्ञान-दृष्टि से इसके बाद की पूरी कथा देख सकते हैं। क्षत्रिय कुल की रक्षा कीजिए और उन पर अपनी कृपा बरसाइए।
 
Shakuntala said— Father! Illilkumar Maharaj Dushyant had come to this forest. By chance he came to this ashram and I accepted him as my husband. Father! You should be pleased with him. That highly successful king is now my master. You can see the entire story after this with your divine vision of knowledge. Give protection to the Kshatriya clan and shower your blessings on them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)