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mahabharat 1.73.6: दुष्यंत बोले - वराह! तुम्हारा शील और स्वभाव प्रशंसनीय है। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे सहर्ष स्वीकार करो। मैं यहाँ तुम्हारे लिए ही रह रहा हूँ। मेरा मन केवल तुम्हारे ही प्रति समर्पित है।   |   mahabharat अध्याय 1.73: शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 73: शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.73.6 
दुष्यन्त उवाच
इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते।
त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि त्वद्‍गतं हि मनो मम॥ ६॥
 
 
अनुवाद
दुष्यंत बोले - वराह! तुम्हारा शील और स्वभाव प्रशंसनीय है। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे सहर्ष स्वीकार करो। मैं यहाँ तुम्हारे लिए ही रह रहा हूँ। मेरा मन केवल तुम्हारे ही प्रति समर्पित है।
 
Dushyant said - Vararohe! Your modesty and nature are praiseworthy. I want you to accept me willingly. I am staying here only for you. My mind is devoted to you only.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)