श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 73: शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.73.34 
वैशम्पायन उवाच
ततो धर्मिष्ठतां वव्रे राज्याच्चास्खलनं तथा।
शकुन्तला पौरवाणां दुष्यन्तहितकाम्यया॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तब शकुन्तला ने दुष्यन्त के कल्याण की कामना से यह वर माँगा कि पुरुवंशी राजा सदैव अपने धर्म में दृढ़ रहें और राज्य से कभी भ्रष्ट न हों॥34॥
 
Vaishampayanji says- Janamejaya! Then Shakuntala, wishing for the welfare of Dushyant, asked for this boon that the kings of Puruvanshi should always remain steadfast in their religion and should never be corrupted by the kingdom. 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)