वैशम्पायन उवाच
इति तस्या: प्रतिश्रुत्य स नृपो जनमेजय।
मनसा चिन्तयन् प्रायात् काश्यपं प्रति पार्थिव:॥ २२॥
भगवांस्तपसा युक्त: श्रुत्वा किं नु करिष्यति।
एवं स चिन्तयन्नेव प्रविवेश स्वकं पुरम्॥ २३॥
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! शकुन्तला को यह वचन देकर नरराज दुष्यंत आश्रम से चले गए। उन्हें महर्षि कण्व की बड़ी चिंता हुई। उन्हें आश्चर्य हुआ कि तपस्वी भगवान कण्व यह सब सुनकर क्या करेंगे। इस प्रकार चिंतित होकर राजा ने अपने नगर में प्रवेश किया।
Vaishampayana says - Janamejaya! After making this promise to Shakuntala, the king of men, Dushyant left the ashram. He was very worried about Maharishi Kanva. He wondered what the ascetic Lord Kanva would do after hearing all this. Worried like this, the king entered his city.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥