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mahabharat 1.73.18: वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! शकुन्तला की यह बात सुनकर राजा दुष्यंत ने बिना यह सोचे कि ऐसा ही होगा, उत्तर दिया।' उन्होंने शकुन्तला से कहा, 'हे जनमेजय! मैं तुम्हें शीघ्र ही अपने नगर में ले जाऊँगा।' 18.   |   mahabharat अध्याय 1.73: शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 73: शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.73.18 
वैशम्पायन उवाच
एवमस्त्विति तां राजा प्रत्युवाचाविचारयन्।
अपि च त्वां हि नेष्यामि नगरं स्वं शुचिस्मिते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! शकुन्तला की यह बात सुनकर राजा दुष्यंत ने बिना यह सोचे कि ऐसा ही होगा, उत्तर दिया।' उन्होंने शकुन्तला से कहा, 'हे जनमेजय! मैं तुम्हें शीघ्र ही अपने नगर में ले जाऊँगा।' 18.
 
Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! On hearing this from Shakuntala, King Dushyant replied without thinking that it will be so.' He said to Shakuntala, 'Pure! I will soon take you to my city.' 18.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)