श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 72: मेनका-विश्वामित्र-मिलन, कन्याकी उत्पत्ति, शकुन्त पक्षियोंके द्वारा उसकी रक्षा और कण्वका उसे अपने आश्रमपर लाकर शकुन्तला नाम रखकर पालन करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.72.4 
सागच्छत् त्वरिता भूमिं वासस्तदभिलिप्सती।
स्मयमानेव सव्रीडं मारुतं वरवर्णिनी॥ ४॥
 
 
अनुवाद
यह देखकर सुन्दरी मेनका लज्जित हो गई और हँसकर वायुदेव को कोसने लगी और वस्त्र को उठाने की इच्छा से तुरन्त उस ओर दौड़ी, जहाँ वह वस्त्र गिरा था॥4॥
 
Seeing this the beautiful Menaka felt shy and smilingly cursed the god of wind and immediately ran towards the place where the cloth had fallen with the desire to pick it up. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)