शकुन्तलोवाच
एतदाचष्ट पृष्ट: सन् मम जन्म महर्षये।
सुतां कण्वस्य मामेवं विद्धि त्वं मनुजाधिप॥ १८॥
कण्वं हि पितरं मन्ये पितरं स्वमजानती।
इति ते कथितं राजन् यथावृत्तं श्रुतं मया॥ १९॥
अनुवाद
शकुन्तला कहती है - राजन! उस ऋषि के पूछने पर मेरे पिता कण्व ने उन्हें मेरे जन्म की यह कथा सुनाई थी। इस प्रकार आप मुझे कण्व की पुत्री ही मानें। मैं अपने पिता को नहीं जानती, किन्तु कण्व को ही अपना पिता मानती हूँ। महाराज! इस प्रकार मैंने जो कथाएँ सुनी थीं, वे सब आपसे कह सुनाईं॥ 18-19॥
Shakuntala says - King! When that sage asked, my father Kanva told him this story of my birth. In this way, you should consider me as Kanva's daughter. I do not know my biological father, but I consider Kanva as my father. Maharaj! In this way, I have told you all the stories that I had heard.॥ 18-19॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने द्विसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥