Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.71.d5-d10h: 'हे हाथी की सूँड़ के समान जांघों वाली मतवाली सुन्दरी! मेरी बात सुनो; मैं राजा पुरु के वंश में उत्पन्न राजा दुष्यंत हूँ। आज मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में वरण करता हूँ। क्षत्रिय कन्या के अतिरिक्त मेरा मन किसी अन्य स्त्री की ओर नहीं जाता। अन्य ऋषि कन्याओं, भिन्न वर्ण की कन्याओं तथा अन्य वर्ण की स्त्रियों की ओर भी मेरा मन नहीं जाता। मधुरभाषी कन्या! तुम्हें यह जानना चाहिए कि मैं अपने मन को पूर्णतः वश में रखता हूँ। इतना होते हुए भी मैं तुम्हारी ओर आकर्षित हो रहा हूँ, अतः तुम क्षत्रिय कन्या हो। बताओ, तुम कौन हो? कायर! मेरा मन एक ब्राह्मण कन्या की ओर आकर्षित नहीं हो सकता। बड़े-बड़े नेत्रों वाली सुन्दरी! मैं तुम्हारा भक्त हूँ; मैं तुम्हारी सेवा करना चाहता हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो। बड़े-बड़े नेत्रों वाली! मेरे राज्य का भोग करो। मेरे प्रति अन्यथा विचार मत करो, मुझे पराया मत समझो।' | mahabharat अध्याय 1.71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
(शृणु मे नागनासोरु वचनं मत्तकाशिनि॥
राजर्षेरन्वये जात: पूरोरस्मि विशेषत:।
वृणे त्वामद्य सुश्रोणि दुष्यन्तो वरवर्णिनि॥
न मेऽन्यत्र क्षत्रियायां मनो जातु प्रवर्तते।
ऋषिपुत्रीषु चान्यासु नावर्णासु परासु वा॥
तस्मात् प्रणिहितात्मानं विद्धि मां कलभाषिणि।
तस्य मे त्वयि भावोऽस्ति क्षत्रिया ह्यसि का वद॥
न हि मे भीरु विप्रायांमन: प्रसहते गतिम्।
भजे त्वामायतापाङ्गि भक्तं भजितुमर्हसि॥
भुङ्क्ष्व राज्यं विशालाक्षि बुद्धिं मा त्वन्यथा कृथा:।)
अनुवाद
'हे हाथी की सूँड़ के समान जांघों वाली मतवाली सुन्दरी! मेरी बात सुनो; मैं राजा पुरु के वंश में उत्पन्न राजा दुष्यंत हूँ। आज मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में वरण करता हूँ। क्षत्रिय कन्या के अतिरिक्त मेरा मन किसी अन्य स्त्री की ओर नहीं जाता। अन्य ऋषि कन्याओं, भिन्न वर्ण की कन्याओं तथा अन्य वर्ण की स्त्रियों की ओर भी मेरा मन नहीं जाता। मधुरभाषी कन्या! तुम्हें यह जानना चाहिए कि मैं अपने मन को पूर्णतः वश में रखता हूँ। इतना होते हुए भी मैं तुम्हारी ओर आकर्षित हो रहा हूँ, अतः तुम क्षत्रिय कन्या हो। बताओ, तुम कौन हो? कायर! मेरा मन एक ब्राह्मण कन्या की ओर आकर्षित नहीं हो सकता। बड़े-बड़े नेत्रों वाली सुन्दरी! मैं तुम्हारा भक्त हूँ; मैं तुम्हारी सेवा करना चाहता हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो। बड़े-बड़े नेत्रों वाली! मेरे राज्य का भोग करो। मेरे प्रति अन्यथा विचार मत करो, मुझे पराया मत समझो।'
‘Drunk beauty with thighs like elephant trunks! Listen to me; I am King Dushyant born in the lineage of King Puru. Today I choose you to be my wife. My mind never turns towards any other woman except a Kshatriya girl. My mind does not even turn towards other Rishi daughters, girls of different castes and women of other castes. Sweet spoken girl! You should know that I keep my mind completely under control. Despite this, I am feeling attracted towards you, hence you are a Kshatriya girl. Tell me, who are you? Coward! My mind cannot bear to be attracted towards a Brahmin girl. Beautiful girl with big eyes! I am your devotee; I want to serve you; you accept me. Big eyed one! Enjoy my kingdom. Do not think otherwise towards me, do not consider me a stranger.’
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥