श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना  »  श्लोक d11
 
 
श्लोक  1.71.d11 
(अस्वतन्त्रास्मि राजेन्द्र काश्यपो मे गुरु: पिता।
तमेव प्रार्थय स्वार्थं नायुक्तं कर्तुमर्हसि॥ )
 
 
अनुवाद
'राजेन्द्र! मैं दास हूँ। कश्यपपुत्र महर्षि कण्व मेरे गुरु और पिता हैं। तुम्हें अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए उनसे प्रार्थना करनी चाहिए। तुम्हें कोई भी अनुचित कार्य नहीं करना चाहिए।'
 
‘Rajendra! I am a slave. Maharishi Kanva, son of Kashyapan, is my Guru and father. You should pray to him for the success of your purpose. You should not do any wrong thing.’
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas