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mahabharat 1.71.37: ऐसी प्रज्वलित अग्नि को, महान तपस्वी को, तथा अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाले को, मेरे समान स्त्री कैसे स्पर्श कर सकती है?॥37॥   |   mahabharat अध्याय 1.71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.71.37 
तादृशं तपसा युक्तं प्रदीप्तमिव पावकम्।
कथमस्मद्विधा नारी जितेन्द्रियमभिस्पृशेत्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
ऐसी प्रज्वलित अग्नि को, महान तपस्वी को, तथा अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाले को, मेरे समान स्त्री कैसे स्पर्श कर सकती है?॥37॥
 
How can a woman like me touch such a blazing fire, a great ascetic and one who has controlled his senses?॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)