श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.71.35 
एतानि यस्य कर्माणि तस्याहं भृशमुद्विजे।
यथासौ न दहेत् क्रुद्धस्तथाऽऽज्ञापय मां विभो॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
मैं उन महान् आत्माओं से बहुत भयभीत हूँ जिन्होंने ऐसे अद्भुत कर्म किए हैं। हे प्रभु! मुझे ऐसा कार्य करने की आज्ञा दीजिए जिससे वे क्रोधित होकर मुझे भस्म न कर दें ॥35॥
 
I am very afraid of those great souls who have performed such wonderful deeds. O Lord! Please order me to do such a task so that they do not become angry and burn me to ashes. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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