श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.71.28 
तेजसस्तपसश्चैव कोपस्य च महात्मन:।
त्वमप्युद्विजसे यस्य नोद्विजेयमहं कथम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जिनके तेज, तप और क्रोध से तुम भी व्याकुल हो जाते हो, उन महात्मा से मैं कैसे न डरूँ?॥ 28॥
 
How can I not be afraid of that great soul whose brilliance, austerity and anger disturb even you?॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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