श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.71.16 
दुष्यन्त उवाच
ऊर्ध्वरेता महाभागे भगवाँल्लोकपूजित:।
चलेद्धि वृत्ताद् धर्मोऽपि न चलेत् संशितव्रत:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
दुष्यंत बोले - हे महामुनि! विश्ववंद्य कण्व परम ब्रह्मचारी हैं। वे अत्यन्त कठोर व्रतों का पालन करते हैं। धर्मराज भी अपने सदाचार से विचलित हो सकते हैं, किन्तु महर्षि कण्व नहीं। 16॥
 
Dushyant said – Oh great one! Vishvavandya Kanva is a devout celibate. They observe very strict fasts. Even the king of Dharma can deviate from his good conduct, but not Maharishi Kanva. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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