श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.71.15 
कण्वस्याहं भगवतो दुष्यन्त दुहिता मता।
तपस्विनो धृतिमतो धर्मज्ञस्य महात्मन:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'महाराज दुष्यंत! मैं तपस्वी, सदाचारिणी, धर्मात्मा और महात्मा भगवान कण्व की पुत्री मानी जाती हूँ। 15॥
 
'Maharaj Dushyant! I am considered to be an ascetic, virtuous, religious and the daughter of Mahatma Lord Kanva. 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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