श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 71: राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  1.71.10-11 
वैशम्पायन उवाच
अपश्यमानस्तमृषिं तथा चोक्तस्तया च स:।
तां दृष्ट्वा च वरारोहां श्रीमतीं चारुहासिनीम्॥ १०॥
विभ्राजमानां वपुषा तपसा च दमेन च।
रूपयौवनसम्पन्नामित्युवाच महीपति:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! राजा दुष्यंत ने देखा कि महर्षि कण्व आश्रम पर नहीं हैं और वह तपस्वी कन्या उनसे वहीं रहने का आग्रह कर रही है; उसी समय उनका ध्यान इस ओर भी गया कि यह कन्या सर्वांगसुन्दर, असाधारण सौन्दर्य से संपन्न और मनमोहक मुस्कान से सुशोभित है। उसका शरीर सौन्दर्य की आभा से चमक रहा था, तपस्या तथा मन और इन्द्रियों के संयम ने उसे असाधारण तेज से भर दिया था। वह अद्वितीय सौन्दर्य और नवीन यौवन से दमक रही थी, यह सब सोचकर राजा ने पूछा-॥10-11॥
 
Vaishampayana says- Janamejaya! King Dushyant saw that Maharishi Kanva was not at the ashram and that ascetic girl was asking him to stay there; at the same time his attention also went towards the fact that this girl was beautiful in all respects, blessed with extraordinary beauty and adorned with a charming smile. Her body was glowing with the radiance of beauty, penance and control of the mind and senses had filled her with extraordinary radiance. She was glowing with a unique beauty and new youth, thinking all this the king asked-॥10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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