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mahabharat 1.70.51: महर्षि कण्व का आश्रम, जहाँ वे स्वयं रहते थे, चारों ओर से महान व्रतधारी तपस्वी महर्षियों से घिरा हुआ था। वह अत्यंत सुंदर, शुभ और एकांत स्थान था। शत्रुओं का नाश करने वाले राजा दुष्यंत अपने मंत्री और पुरोहित के साथ उस आश्रम की सीमा में प्रविष्ट हुए। 51.   |   mahabharat अध्याय 1.70: तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 70: तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  1.70.51 
स काश्यपस्यायतनं महाव्रतै-
र्वृतं समन्तादृषिभिस्तपोधनै:।
विवेश सामात्यपुरोहितोऽरिहा
विविक्तमत्यर्थमनोहरं शुभम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
महर्षि कण्व का आश्रम, जहाँ वे स्वयं रहते थे, चारों ओर से महान व्रतधारी तपस्वी महर्षियों से घिरा हुआ था। वह अत्यंत सुंदर, शुभ और एकांत स्थान था। शत्रुओं का नाश करने वाले राजा दुष्यंत अपने मंत्री और पुरोहित के साथ उस आश्रम की सीमा में प्रविष्ट हुए। 51.
 
The hermitage of Maharishi Kanva, where he himself lived, was surrounded on all sides by ascetic Maharishi's who were observing great vows. It was a very beautiful, auspicious and secluded place. King Dushyant, the destroyer of enemies, entered its boundary with his minister and priest. 51.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)