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mahabharat 1.70.42-46: यज्ञवेदी के निर्माण में पारंगत, क्रम और शिक्षा में कुशल, न्याय और आत्म-अनुभव के सिद्धान्तों से युक्त, वेदों में पारंगत, परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले बहुत से वाक्यों को भी एक वाक्य बनाने में निपुण, भिन्न-भिन्न शाखाओं के गुणों को एक शाखा में संक्षेपित करने की कला में निपुण, उपासना आदि विशेष क्रियाओं में पारंगत, मोक्षधर्म में तत्पर, अपने सिद्धान्त को स्थापित करके, उसमें शंका प्रकट करके उसका परिहार करने वाले, व्याकरण, छन्दशास्त्र में अत्यंत निपुण, उस सिद्धान्त के समर्थन में राजा दुष्यंत ने निरुक्त, ज्योतिष और शिक्षा के तथा कल्प-वेद के इन छह अंगों के सभी विद्वानों से, द्रव्य के गुण, शुभाशुभ कर्म, सत्व, रज, तम आदि को जानने वालों से, क्रिया (दृश्य वर्ग) और कारण (मूल प्रकृति) को जानने वालों से, पशु-पक्षियों की वाणी को समझने वालों से, व्यास ग्रन्थ की सहायता से मन्त्रों का अर्थ करने वालों से तथा नाना प्रकार के शास्त्रों के प्रमुख विद्वानों से जो वहाँ रहकर उन सबका पाठ कर रहे थे, राजा दुष्यंत ने उनकी बात सुनी। उस आश्रम में चारों ओर लोगों का मनोरंजन करने वाले कुछ लोगों की बातें भी सुनाई दे रही थीं।   |   mahabharat अध्याय 1.70: तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 70: तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 42-46
 
 
श्लोक  1.70.42-46 
यज्ञसंस्तरविद्भिश्च क्रमशिक्षाविशारदै:।
न्यायतत्त्वात्मविज्ञानसम्पन्नैर्वेदपारगै:॥ ४२॥
नानावाक्यसमाहारसमवायविशारदै: ।
विशेषकार्यविद्भिश्च मोक्षधर्मपरायणै:॥ ४३॥
स्थापनाक्षेपसिद्धान्तपरमार्थज्ञतां गतै:।
शब्दच्छन्दोनिरुक्तज्ञै: कालज्ञानविशारदै:॥ ४४॥
द्रव्यकर्मगुणज्ञैश्च कार्यकारणवेदिभि:।
पक्षिवानररुतज्ञैश्च व्यासग्रन्थसमाश्रितै:॥ ४५॥
नानाशास्त्रेषु मुख्यैश्च शुश्राव स्वनमीरितम्।
लोकायतिकमुख्यैश्च समन्तादनुनादितम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
यज्ञवेदी के निर्माण में पारंगत, क्रम और शिक्षा में कुशल, न्याय और आत्म-अनुभव के सिद्धान्तों से युक्त, वेदों में पारंगत, परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले बहुत से वाक्यों को भी एक वाक्य बनाने में निपुण, भिन्न-भिन्न शाखाओं के गुणों को एक शाखा में संक्षेपित करने की कला में निपुण, उपासना आदि विशेष क्रियाओं में पारंगत, मोक्षधर्म में तत्पर, अपने सिद्धान्त को स्थापित करके, उसमें शंका प्रकट करके उसका परिहार करने वाले, व्याकरण, छन्दशास्त्र में अत्यंत निपुण, उस सिद्धान्त के समर्थन में राजा दुष्यंत ने निरुक्त, ज्योतिष और शिक्षा के तथा कल्प-वेद के इन छह अंगों के सभी विद्वानों से, द्रव्य के गुण, शुभाशुभ कर्म, सत्व, रज, तम आदि को जानने वालों से, क्रिया (दृश्य वर्ग) और कारण (मूल प्रकृति) को जानने वालों से, पशु-पक्षियों की वाणी को समझने वालों से, व्यास ग्रन्थ की सहायता से मन्त्रों का अर्थ करने वालों से तथा नाना प्रकार के शास्त्रों के प्रमुख विद्वानों से जो वहाँ रहकर उन सबका पाठ कर रहे थे, राजा दुष्यंत ने उनकी बात सुनी। उस आश्रम में चारों ओर लोगों का मनोरंजन करने वाले कुछ लोगों की बातें भी सुनाई दे रही थीं।
 
Knowledgeable in the construction of Yajnavedi, skilled in the order and teachings, full of the principles of justice and self-experience, well-versed in the Vedas, adept in making a single sentence out of many sentences which seem to contradict each other, adept in the art of summarizing the qualities of different branches in one branch, knowledgeable in special activities like worship, ready in Mokshadharma, having established his theory, raising doubts in it and avoiding it, extremely proficient in grammar, rhymes, in support of that theory. King Dushyant listened to all the scholars of Nirukta, astrology and education and these six parts of Kalpa-Veda, those who knew the qualities of substance, auspicious and auspicious deeds, Sattva, Raja, Tama etc., those who knew about action (visible class) and cause (original nature), those who understood the speech of animals and birds, those who interpreted mantras with the help of Vyas Granth and the prominent scholars of various scriptures who were staying there and were reciting all of them. The talks of some people who were entertaining the people could also be heard all around in that ashram. 42-46.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)