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mahabharat 1.70.14: फूलों से लदे वृक्ष एक-दूसरे से लिपटे हुए थे और उनकी शाखाएँ एक-दूसरे को छू रही थीं। वे गगनचुम्बी वृक्ष इन्द्र के ध्वज के समान प्रतीत हो रहे थे और उनके कारण वह वन अत्यंत सुन्दर हो रहा था।   |   mahabharat अध्याय 1.70: तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 70: तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.70.14 
परस्पराश्लिष्टशाखै: पादपै: कुसुमान्वितै:।
अशोभत वनं तत् तु महेन्द्रध्वजसंनिभै:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
फूलों से लदे वृक्ष एक-दूसरे से लिपटे हुए थे और उनकी शाखाएँ एक-दूसरे को छू रही थीं। वे गगनचुम्बी वृक्ष इन्द्र के ध्वज के समान प्रतीत हो रहे थे और उनके कारण वह वन अत्यंत सुन्दर हो रहा था।
 
The trees laden with flowers were hugging each other with their branches touching each other. Those sky high trees looked like Indra's flag and because of them the forest was becoming very beautiful.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)