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mahabharat 1.7.4: ‘इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य का वास्तविक रहस्य जानने के बाद भी उसके बारे में पूछे जाने पर उसे प्रकट नहीं करता और चुप रहता है, तो वह भी उसी पाप में लिप्त होता है; इसमें कोई संदेह नहीं है।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.7.4 
यश्च कार्यार्थतत्त्वज्ञो जानानोऽपि न भाषते।
सोऽपि तेनैव पापेन लिप्यते नात्र संशय:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
‘इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य का वास्तविक रहस्य जानने के बाद भी उसके बारे में पूछे जाने पर उसे प्रकट नहीं करता और चुप रहता है, तो वह भी उसी पाप में लिप्त होता है; इसमें कोई संदेह नहीं है।॥4॥
 
‘Similarly, if a person who knows the real secret of a work does not reveal it when asked about it, and remains silent, then he too is involved in the same sin; there is no doubt about this.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)