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mahabharat 1.7.22: 'तुम अपने सम्पूर्ण शरीर से सर्वभक्षी नहीं होगे। अग्निदेव! तुम्हारे स्वदेश में जो ज्वालाएँ होंगी, वे सब कुछ भस्म कर देंगी। 22॥   |   mahabharat अध्याय 1.7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.7.22 
न त्वं सर्वशरीरेण सर्वभक्षत्वमेष्यसि।
अपाने ह्यर्चिषो यास्ते सर्वं भक्ष्यन्ति ता: शिखिन्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'तुम अपने सम्पूर्ण शरीर से सर्वभक्षी नहीं होगे। अग्निदेव! तुम्हारे स्वदेश में जो ज्वालाएँ होंगी, वे सब कुछ भस्म कर देंगी। 22॥
 
‘You will not be omnivorous with your entire body. Agnidev! The flames that will be in your home country will consume everything. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)