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mahabharat 1.7.17-18h: महाभाग! किसी कारणवश महर्षि भृगुन ने अग्निदेव को सर्वभक्षी होने का शाप दे दिया है, किन्तु वे सम्पूर्ण देवताओं के मुख, यज्ञभाग के आदिभक्षक तथा सम्पूर्ण लोकों में दी जाने वाली हविओं के भक्षक होने पर भी सर्वभक्षी कैसे हो सकते हैं? 17 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 1.7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  1.7.17-18h 
भृगुणा वै महाभाग शप्तोऽग्नि: कारणान्तरे।
कथं देवमुखो भूत्वा यज्ञभागाग्रभुक् तथा॥ १७॥
हुतभुक् सर्वलोकेषु सर्वभक्षत्वमेष्यति।
 
 
अनुवाद
महाभाग! किसी कारणवश महर्षि भृगुन ने अग्निदेव को सर्वभक्षी होने का शाप दे दिया है, किन्तु वे सम्पूर्ण देवताओं के मुख, यज्ञभाग के आदिभक्षक तथा सम्पूर्ण लोकों में दी जाने वाली हविओं के भक्षक होने पर भी सर्वभक्षी कैसे हो सकते हैं? 17 1/2॥
 
'Mahabhaag! For some reason, Maharishi Bhrigun has cursed Agnidev to be omnivorous, but how can he become omnivorous even though he is the mouth of all the gods, the primary consumer of Yagya Bhag and the consumer of the offerings given in all the worlds?' 17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)