अमावास्यां हि पितर: पौर्णमास्यां हि देवता:।
मन्मुखेनैव हूयन्ते भुञ्जते च हुतं हवि:॥ ११॥
सर्वभक्ष: कथं त्वेषां भविष्यामि मुखं त्वहम्।
अनुवाद
'अमावस्या को पितरों का और पूर्णिमा को देवताओं का तर्पण मेरे मुख से ही होता है। तथा देवता और पितर उस तर्पण को ग्रहण करते हैं। मैं सर्वभक्षी होने के कारण उन सबका मुख कैसे हो सकता हूँ?'॥11/2॥
'On the new moon day, the offerings are made to the ancestors and on the full moon day, the offerings to the gods are made from my mouth only. And the gods and ancestors consume the offerings received as sacrifices. Being an omnivorous person, how can I be the mouth of all of them?'॥ 11/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥