Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.7.11-12h: 'अमावस्या को पितरों का और पूर्णिमा को देवताओं का तर्पण मेरे मुख से ही होता है। तथा देवता और पितर उस तर्पण को ग्रहण करते हैं। मैं सर्वभक्षी होने के कारण उन सबका मुख कैसे हो सकता हूँ?'॥11/2॥   |   mahabharat अध्याय 1.7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  1.7.11-12h 
अमावास्यां हि पितर: पौर्णमास्यां हि देवता:।
मन्मुखेनैव हूयन्ते भुञ्जते च हुतं हवि:॥ ११॥
सर्वभक्ष: कथं त्वेषां भविष्यामि मुखं त्वहम्।
 
 
अनुवाद
'अमावस्या को पितरों का और पूर्णिमा को देवताओं का तर्पण मेरे मुख से ही होता है। तथा देवता और पितर उस तर्पण को ग्रहण करते हैं। मैं सर्वभक्षी होने के कारण उन सबका मुख कैसे हो सकता हूँ?'॥11/2॥
 
'On the new moon day, the offerings are made to the ancestors and on the full moon day, the offerings to the gods are made from my mouth only. And the gods and ancestors consume the offerings received as sacrifices. Being an omnivorous person, how can I be the mouth of all of them?'॥ 11/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)