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mahabharat 1.7.10: ‘मुझे अर्पित किया गया हविष्य देवता और पितर दोनों ही ग्रहण करते हैं। इसीलिए मुझे देवताओं और पितर दोनों का मुख माना जाता है॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 7: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.7.10 
देवता: पितरश्चैव भुञ्जते मयि यद् हुतम्।
देवतानां पितॄणां च मुखमेतदहं स्मृतम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘मुझे अर्पित किया गया हविष्य देवता और पितर दोनों ही ग्रहण करते हैं। इसीलिए मुझे देवताओं और पितर दोनों का मुख माना जाता है॥10॥
 
‘The offerings made to me are consumed by both the gods and the ancestors. That is why I am considered the mouth of the gods and ancestors.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)