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विषमं पर्वतस्रस्तैरश्मभिश्च समावृतम्।
निर्जलं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम्॥ १८॥
अनुवाद
पर्वत शिखर से गिरी हुई अनेक शिलाएँ इधर-उधर पड़ी थीं। ऊबड़-खाबड़ भूमि के कारण वह वन अत्यंत दुर्गम प्रतीत हो रहा था। अनेक योजनों तक फैले उस वन में जल या मनुष्य का नामोनिशान नहीं था॥18॥
Many rocks that had fallen from the mountain peak were lying here and there. Due to the uneven terrain, that forest seemed very inaccessible. There was no trace of water or human beings in that forest that was spread over many yojanas.॥ 18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥