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mahabharat 1.69.13-14: इस प्रकार, राजा बड़ी खुशी-खुशी नगर छोड़कर जंगल में जंगली जानवरों का शिकार करने निकल पड़े। वे देवताओं के राजा इंद्र के समान पराक्रमी थे। सभी जातियों के लोग, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, उन्मत्त हाथी की पीठ पर सवार महाराज दुष्यंत के पीछे-पीछे चल रहे थे और सभी उन्हें आशीर्वाद और विजय के वचनों के साथ समृद्धि की कामना करते हुए देख रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 1.69: दुष्यन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 69: दुष्यन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  1.69.13-14 
निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया।
तं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधूर्गतम्॥ १३॥
द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे।
ददृशुर्वर्धमानास्ते आशीर्भिश्च जयेन च॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार, राजा बड़ी खुशी-खुशी नगर छोड़कर जंगल में जंगली जानवरों का शिकार करने निकल पड़े। वे देवताओं के राजा इंद्र के समान पराक्रमी थे। सभी जातियों के लोग, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, उन्मत्त हाथी की पीठ पर सवार महाराज दुष्यंत के पीछे-पीछे चल रहे थे और सभी उन्हें आशीर्वाद और विजय के वचनों के साथ समृद्धि की कामना करते हुए देख रहे थे।
 
Thus, the King left the city very happily to hunt wild animals in the forest. He was as valiant as the king of gods Indra. People of all castes, Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras followed Maharaj Dushyanta who was travelling on the back of a mad elephant and all kept looking at him wishing him prosperity with blessings and words of victory.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)