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mahabharat 1.68.7-8: हे पुरुषश्रेष्ठ! सभी लोग धर्म से प्रेम करते थे और उसका पालन करते थे। इसलिए धर्म और अर्थ दोनों ही उन्हें स्वतः प्राप्त थे। हे प्रिय! जब राजा दुष्यंत इस देश के शासक थे, तब चोरों का भय नहीं था। भूख का नाम मात्र भी भय नहीं था। दुष्यंत के शासनकाल में इस देश में रोगों का भय बिल्कुल नहीं था। 7-8।   |   mahabharat अध्याय 1.68: राजा दुष्यन्तकी अद्‍भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 68: राजा दुष्यन्तकी अद्‍भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  1.68.7-8 
धर्मे रतिं सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे।
तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे॥ ७॥
नासीच्चौरभयं तात न क्षुधाभयमण्वपि।
नासीद् व्याधिभयं चापि तस्मिञ्जनपदेश्वरे॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! सभी लोग धर्म से प्रेम करते थे और उसका पालन करते थे। इसलिए धर्म और अर्थ दोनों ही उन्हें स्वतः प्राप्त थे। हे प्रिय! जब राजा दुष्यंत इस देश के शासक थे, तब चोरों का भय नहीं था। भूख का नाम मात्र भी भय नहीं था। दुष्यंत के शासनकाल में इस देश में रोगों का भय बिल्कुल नहीं था। 7-8।
 
O best of men! All people loved Dharma and followed it. Hence, both Dharma and Artha were automatically available to them. O dear! When King Dushyant was the ruler of this country, there was no fear of thieves. There was no fear of hunger even in the name. During the reign of Dushyant, there was absolutely no fear of diseases in this country. 7-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)