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mahabharat 1.68.12-13: वे दोनों हाथों से वृक्षों और तटों सहित मंदराचल को उठाकर ले जाने में समर्थ थे। वे चारों प्रकार की गदा-युद्ध कला में निपुण थे - प्रक्षेप 1, प्रक्षेप 2, प्रक्षेप 3 और प्रक्षेप 4 - तथा समस्त अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में भी वे अत्यंत निपुण थे। घोड़े और हाथी की पीठ पर बैठने की कला में वे अत्यंत निपुण थे। बल में वे भगवान विष्णु के समान और तेज में सूर्य के समान थे। 12-13॥   |   mahabharat अध्याय 1.68: राजा दुष्यन्तकी अद्‍भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 68: राजा दुष्यन्तकी अद्‍भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  1.68.12-13 
उद्यम्य मन्दरं दोर्भ्यां वहेत् सवनकाननम्।
चतुष्पथगदायुद्धे सर्वप्रहरणेषु च॥ १२॥
नागपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च बभूव परिनिष्ठित:।
बले विष्णुसमश्चासीत् तेजसा भास्करोपम:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वे दोनों हाथों से वृक्षों और तटों सहित मंदराचल को उठाकर ले जाने में समर्थ थे। वे चारों प्रकार की गदा-युद्ध कला में निपुण थे - प्रक्षेप 1, प्रक्षेप 2, प्रक्षेप 3 और प्रक्षेप 4 - तथा समस्त अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में भी वे अत्यंत निपुण थे। घोड़े और हाथी की पीठ पर बैठने की कला में वे अत्यंत निपुण थे। बल में वे भगवान विष्णु के समान और तेज में सूर्य के समान थे। 12-13॥
 
He had the power to lift and carry Mandarachal along with the groves and banks with both his hands. He was skilled in all four types of mace fighting - Projection 1, Projection 2, Projection 3 and Projection 4 - and was highly adept in the knowledge of all weapons. He was very proficient in the art of sitting on the back of horse and elephant. In strength he was like Lord Vishnu and in brightness he was like the Sun. 12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)