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mahabharat 1.67.93-105: वैशम्पायन जी ने कहा- राजन्! सुनिए- 1 दुर्योधन, 2 युयुत्सु, 3 दु:शासन, 4 दु:सह, 5 दु:शाल, 6 दुर्मुख, 7 विविंशति, 8 विकर्ण, 9 जलसंध, 10 सुलोचन, 11 विन्द, 12 अनुविन्द, 13 दुर्धर्ष, 14 सुबाहु, 15 दुष्प्रदर्शन, 16 दुर्मर्षण, 17 दुर्मुख, 18 दुष्कर्ण, 19 कर्ण, 20 चित्र, 21 उपचित्र, 22 चित्राक्ष, 23 चारु, 24 चित्रांगदा, 25 दुर्मद, 26 दुष्प्रदर्श, 27 विवित्सु, 28 विकट, 29 सैम, 30 ओर्नाभ, 31 पद्मनाभ, 32 नंद, 33 उपनंद, 53 कनकायु, 54 धरायुध, 55 धरथवर्मा, 56 धरक्षत्र, 57 सोमकीर्ति, 58 अनुदार, 59 जरासंध, 60 धारहसंध, 61 सत्यसंध, 62 सहस्रावक, 63 उग्रश्रवा, 64 उग्रसेन, 65 क्षेममूर्ति, 66 अपराजित, 67 पण्डितक, 68 विशालाक्ष, 69 दुराधन, 70 धारहस्थ, 71 सुहस्थ, 72 वातवेग, 73 सुवर्चा, 74 आदित्यकेतु, 75 बहावशी, 76 नागदत्त, 77 अनुयायी, 78 कवची, 79 निशानगी, 80 दंडी, 81 दण्डधार, 82 धनुर्ग्रह, 83 उग्र, 84 भीमरथ, 85 वीर, 86 वीरबाहु, 87 अलोलुप, 88 अभय, 89 रौद्रकर्मा, 90 द्रिध्रथ, 91 अनाधृष्य, 92 कुंडभेदी, 93 वीरवि, 94 दीर्घलोचन, 95 दीर्घबाहु, 96 महाबाहु, 97 व्यूधोरु, 98 कनकंगद, 99 कुंडज और 100 चित्रक- ये धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे। उनके अलावा दुशाला नाम की एक पुत्री भी थी। 93—105॥ | mahabharat अध्याय 1.67: देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह