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mahabharat 1.67.83-85h: अरिष्टक का पुत्र, जो हंस नाम से प्रसिद्ध गंधर्व राजा था, व्यासनंदन धृतराष्ट्र के नाम से विख्यात हुआ, जिसने कुरुवंश की वृद्धि की । धृतराष्ट्र की भुजाएँ बहुत बड़ी थीं । वह महान् तेजस्वी राजा प्रज्ञाचक्षु (अंधा) था । वह अपनी माता के दोष और महर्षि के क्रोध के कारण जन्म से अंधा था । 83-84 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 1.67: देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 67: देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन  »  श्लोक 83-85h
 
 
श्लोक  1.67.83-85h 
अरिष्टायास्तु य: पुत्रो हंस इत्यभिविश्रुत:।
स गन्धर्वपतिर्जज्ञे कुरुवंशविवर्धन:॥ ८३॥
धृतराष्ट्र इति ख्यात: कृष्णद्वैपायनात्मज:।
दीर्घबाहुर्महातेजा: प्रज्ञाचक्षुर्नराधिप:॥ ८४॥
मातुर्दोषादृषे: कोपादन्ध एव व्यजायत।
 
 
अनुवाद
अरिष्टक का पुत्र, जो हंस नाम से प्रसिद्ध गंधर्व राजा था, व्यासनंदन धृतराष्ट्र के नाम से विख्यात हुआ, जिसने कुरुवंश की वृद्धि की । धृतराष्ट्र की भुजाएँ बहुत बड़ी थीं । वह महान् तेजस्वी राजा प्रज्ञाचक्षु (अंधा) था । वह अपनी माता के दोष और महर्षि के क्रोध के कारण जन्म से अंधा था । 83-84 1/2॥
 
Arishtaka's son, who was the famous Gandharva king by the name of Hans, became famous by the name of Vyasanandan Dhritarashtra, who increased the Kuru dynasty. Dhritarashtra's arms were very big. That great and brilliant king was Prajnachakshu (blind). He was born blind due to his mother's fault and Maharishi's anger. 83-84 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)