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mahabharat 1.66.45: जिनका नाम च्यवन था । महर्षि च्यवन की तपस्या सदैव प्रज्वलित रहती है । वे पुण्यवान और यशस्वी हैं । हे भारत! अपनी माता को संकट से बचाने के लिए उन्होंने क्रोध करके उन्हें गर्भ से बाहर निकाल दिया था (इसीलिए उनका नाम च्यवन पड़ा ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 1.66: महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 66: महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.66.45 
च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं यशस्विनम्।
य: स रोषाच्च्युतो गर्भान्मातुर्मोक्षाय भारत॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जिनका नाम च्यवन था । महर्षि च्यवन की तपस्या सदैव प्रज्वलित रहती है । वे पुण्यवान और यशस्वी हैं । हे भारत! अपनी माता को संकट से बचाने के लिए उन्होंने क्रोध करके उन्हें गर्भ से बाहर निकाल दिया था (इसीलिए उनका नाम च्यवन पड़ा ॥ 45॥
 
Whose name was Chyavan. Maharishi Chyavan's penance is always ignited. He is virtuous and famous. O Bharata! To save his mother from danger, he was thrown out of the womb in anger (that is why he was called Chyavan).॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)